देखो यार, 'टॉक्सिक' फाइनली रिलीज़ हो गई – बहुत पोस्टपोन के बाद। और जब कोई बड़ी पिक्चर आती है, जैसे 'धुरंधर' हो गई, जैसे 'टॉक्सिक' हो गई – भाई टेंशन इतनी बढ़ जाती है कि रात भर सोया नहीं हूँ, पिक्चर के चक्कर में कि पिक्चर होने कैसे वाली है।
क्योंकि इस पिक्चर से उम्मीद बहुत है। पब्लिक ने एडवांस बुकिंग में ये दिखा दिया है कि यश का जो 4 साल बाद आ रहा है, तो कुछ तो बड़ा लेकर आएगा। तो एनीहाउ, पिक्चर सॉलिड होनी चाहिए, तभी मज़ा आता है।
अब मैं आपको जो बताने वाला हूँ – इसमें ना फैन सर्विस होगी और ना ही कोई ओवरहाइप करूंगा पिक्चर को। जो बोलूंगा, सही बोलूंगा – 5 पॉइंट बोलूंगा।
तीन पॉइंट हैं जो बहुत स्ट्रॉंग हैं और इस फिल्म को बहुत पावर दे सकते हैं। और दो पॉइंट ऐसे हैं जहाँ इम्प्रूवमेंट हो सकती थी और कहीं वो इस फिल्म के लिए नुकसान ना देकर चले जाएँ।
तो पहले पॉजिटिव पॉइंट्स पर बात करेंगे, फिर उन दो नेगेटिव पॉइंट्स पर।
पॉजिटिव पॉइंट 1 – गीतू मोहन दास का जादू
पहला पॉजिटिव पॉइंट – एक मलयाली डायरेक्टर जो अपनी राइटिंग, स्टोरी और स्क्रीनप्ले के लिए जाने जाते हैं – नेशनल अवार्ड विनर डायरेक्टर गीतू मोहन दास। जब यश के साथ आ रहे हैं, तो उससे आप जो उम्मीद लगाकर बैठे थे कि यश की पिक्चर की स्टोरी बहुत सही होने वाली है – वो सब चीज़ें फिल्म में देखने को मिलती हैं।
कहीं पर भी आपको ऐसा नहीं लगेगा कि जबरदस्ती कुछ एड किया गया है। यश का कैरेक्टर बहुत सही तरीके से पोर्ट्रे किया गया है और उसके कैरेक्टर में इमोशंस को अच्छे से पिरोया गया है – जो कि बहुत सही है।
पॉजिटिव पॉइंट 2 – टेक्निकल कमाल
दूसरी बात – टेक्निकल पॉइंट – सिनेमेटोग्राफी, BGM, कलरिंग और लाइट – ये चार स्तंभ हैं इस पिक्चर के। सिनेमेटोग्राफी के फ्रेम्स ऐसे हैं कि आपको हॉलीवुड वाली फील दे देंगे। जो गोवा का एरिया दिखाया है और जो आजादी के बाद की कहानी दिखाई है – उस वक्त को जिस तरीके से कैमरे में उतारा है, वो सच बता रहा हूँ – बहुत पावर लेकर आता है पिक्चर के लिए।
पॉजिटिव पॉइंट 3 – हर कैरेक्टर का अपना इमोशन
तीसरा पॉइंट – और सबसे स्ट्रॉंग – जो अभी तक देखा है, कसम से कह रहा हूँ – हर कैरेक्टर अपना एक इमोशन लेकर आता है। हर कैरेक्टर को यश के आसपास लिखा गया है और वो किसी ना किसी तरीके से यश से कनेक्टेड रहते हैं।
और मैं बोल रहा हूँ – गीतू मोहन दास को मानना पड़ेगा – 4-4, 5-5 लेडीज़ लेकर आए हैं और वो फिल्म को स्ट्रॉंग बना रही हैं, दमदार बना रही हैं। ये सब चीज़ें मुझे अभी तक बहुत पसंद आईं।
पहली नेगेटिव – लंबाई
अब दो पॉइंट जो मुझे भाई तब से सता रहे हैं।
पहली चीज़ – फिल्म की लेंथ – 3 घंटे और 14-15 मिनट। इंटरवल तक आते-आते बीच-बीच में स्टोरी थोड़ी सी प्लैट जाती हुई नज़र आती है – थोड़ी सी लेज़ी लगती है। अब पूरी स्टोरी को देखना बाकी है, लेकिन जहाँ इंटरवल हुआ है, वो इस फिल्म का हाई पॉइंट हो सकता है।
स्टोरी को पूरी तरीके से घुमा दिया गया है। उम्मीद है कि गीतू मोहन दास ने थोड़ा सा जो लैक रखा है कहानी के अंदर इंटरवल से पहले – वो सेकंड हाफ में हमें ना देखने को मिले, तो मज़ा आ जाएगा।
दूसरी नेगेटिव – डबिंग की दिक्कत
दूसरी नेगेटिव पॉइंट – और सबसे खराब जो मुझे लगी – तुमने कन्नड़ भाषा में शूट कर लिया, इंग्लिश भाषा में शूट कर लिया – लेकिन हिंदी मार्केट जो यश के लिए हमेशा से लॉयल रही है, वफादार रही है, उसकी फिल्म को फर्स्ट डे फर्स्ट शो देकर देखने जाती है – डबिंग बहुत लेज़ी हो जाती है।
लिप्स मैच नहीं कर रहे हैं। क्या यह मुझे ही फील हुआ या आपको भी हुआ? इतने इंपोर्टेंट कैरेक्टर, इतने इंपोर्टेंट टाइम के ऊपर कोई डायलॉग आता है – पर आप उस डायलॉग के साथ कनेक्ट नहीं कर पाते – तो कसम से कह रहा हूँ, ये टेक्निकल चीज़ों के ऊपर बहुत ज़रूरी था काम करना।
अब देखने वाली बात होगी – पब्लिक इस चीज़ को कितना इग्नोर कर सकती है।
अभी मैं हाइप्ड हूँ!
अभी मैं हाइप्ड हूँ कि सेकंड पार्ट में कहानी कहाँ मोड़ लेगी। जो-जो चीज़ें मैं सोचकर चल रहा हूँ – अगर उतना भी निकलकर आया, तो कसम से कह रहा हूँ – ये फिल्म फाड़ सकती है।
पर अगर सेकंड हाफ में कहानी और लेज़ी हो गई, तो ये फिल्म के लिए खतरा भी हो सकता है।
आपकी राय क्या है?
क्या आपने 'टॉक्सिक' का फर्स्ट हाफ देखा है? क्या आप इन सब चीज़ों के साथ रिलेट कर रहे हो? मुझे जो चीज़ें लगीं, मैंने आपको बता दी।
बाकी मेरे पूरे रिव्यू के लिए थोड़ा वेट जरूर करना, क्योंकि उसके बाद भी जेनुइन चीज़ें आपके सामने रखने वाला हूँ।
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थैंक्स फॉर रीडिंग।
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मूवी और ट्रेलर रिव्यू

